बात शिक्षित बेरोजगारों की: बिहार राज्य में शिक्षक नियोजन, डिजिटल इंडिया के नाम पर तमाचा।


लंबे इंतजार के बाद प्रदेश में शिक्षकों की बहाली के लिए आवेदन लिए जा रहे हैं।अगले वर्ष के आरंभ में सम्भवतः इनकी बहाली हो जाएगी। काफी हद तक प्रदेश के विद्यालयों में शिक्षकों की कमी दूर होगी। हालांकि सरकार द्वारा जारी रोस्टर को देखने के बाद काफी निराशा होती है कि आखिर किस आधार पर रिक्त पदों की सूची जारी की गई है। क्योंकि यदि यह बहाली पूरी हो भी जाती है तो भी प्रदेश के विभिन्न विद्यालयों में शिक्षकों के लाखों पद रिक्त ही रह जाएंगे। जानकारी के मुताबिक यह नियोजन 2012 की रिक्तियों (बैकलॉग रिक्तियों) के आधार पर ली जा रही है।

खैर, जितने रिक्त पदों के लिए नियोजन की जो प्रक्रिया सरकार ने अपनाई है, वह बेहद ही जटिल और बेतुका प्रतीत होता है। डिजिटल इंडिया का संदेश देने वाली हमारी सरकार का शिक्षा विभाग आवेदकों से आवेदन की हार्ड कॉपी ले रहा है। साथ ही साथ आवेदन पत्र के साथ दशवीं से टीईटी पास करने तक का प्रमाण पत्र संलग्न करने को कहा गया है। यदि ऐसे में देखा जाए तो एक आवेदन पत्र के साथ करीब 12 से 13 पन्ने संलग्न करने पर रहे हैं। बेरोजगारी का आलम ये है कि एक-एक आवेदक डेढ़ सौ से दो सौ विभिन्न नगर निगम/परिषद/पंचायतों, प्रखंडों, एवं ग्राम पंचायतों में आवेदन जमा कर रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक यदि प्रदेश में करीब एक लाख बच्चे भी इस नियोजन के लिए आवेदन करते हैं और एक आवेदक यदि एक सौ जगह आवेदन करता है तो ऐसे में करीब 12 करोड़ पन्ने आवेदन पत्रों के साथ संलग्न होंगे। जो कागजों की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं है। साथ ही साथ डिजिटल इंडिया का संदेश देने वाली हमारी सरकार के गाल पर तमाचा भी है।

यह कहना गलत न होगा कि नियोजन की पूरी प्रक्रिया ही हास्यास्पद लगती है। नौकरी की तलाश में बच्चे आवेदन पत्र लेकर सुबह से शाम तक प्रदेश के विभिन्न नगर निगमों/पंचायतों/परिषदों, प्रखंडों और पंचायतों की खाक छान रहे हैं। क्या हमारी सरकार को नहीं पता कि हमारे प्रदेश के विभिन्न पंचायतों में जाने के लिए यातायात के साधन कितने सुलभ हैं? यदि बच्चे इसी तरह हर पंचायत में जा जाकर आवेदन जमा करते रहे तो उनका कितना वक्त और पैसा बर्बाद होगा। कई बच्चे तो बीमार भी पड़ गए हैं। हमारी बेटी और बहनों को रोज कइयों जगह आवेदन के लिए जाने में न जाने किस-किस तरह की यातनाएं सहनी पड़ रही है।


आवेदन जमा करने की कोई सीमा नहीं होने की वजह से एक-एक बच्चे सौ, दो सौ जगह आवेदन जमा कर रहे हैं। ऐसे में मेधा सूची जारी होने के बाद एक बच्चे का नाम सभी जगहों पर आ जाएगा और किसी का नाम कहीं भी नहीं आ पाएगा। ऐसे में फिर अगली सूची और फिर अगली सूची बनानी होगी। जबकि कई गरीब छात्र जो पैसे के अभाव में पचास जगह आवेदन करने में असमर्थ हैं, उनके लिए इस नियोजन का कोई औचित्य नहीं रह जाता।

आखिर हमारी सरकार यह क्यों नहीं समझती कि वह बेरोजगारों से आवेदन ले रही है, जिनके पास पैसे का अभाव होता है। इतने-इतने कागजों को फोटोस्टेट कर रंगीन फ़ोटो चिपकाकर उन्हें आवेदन के साथ संलग्न करने से न तो छात्रों का कोई फायदा और न ही सरकार का। आज जहां पूरा विश्व पर्यावरण संरक्षण की बात कर रहा है, पेपर लेस काम को बढ़ावा देने के लिए प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। इतने कागजों की बर्बादी करना एक बेहूदा फैसला है। जिसके लिए न जाने कितने पेड़ों की कुर्बानी देनी होगी। सरकार का यह फैसला बिल्कुल ही बेतुका नजर आता है। इस नियोजन प्रक्रिया में काफी सुधार की गुंजाइश है। हमारी सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए। नियोजन की इस प्रक्रिया को कहीं से भी उचित नहीं कहा जा सकता।

क्या ये बेहतर नहीं होता कि सरकार ऑनलाइन आवेदन लेती और उसके बाद खुद थोड़ी मेहनत करती और मेधा सूची जारी करती। ऐसे में न तो छात्रों को इतना भटकना पड़ता, न ही इतने कागजों की बर्बादी होती। हमारी बेटी और बहने भी आसानी से बेहिचक ऑनलाइन आवेदन करते। सम्भव था कि सारे आवेदकों का नियोजन भी हो जाता। 

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1 comment

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  1. Bilkul sahi mudda uathaya gaya hai mai aapke press ka aabhari hu. Is bat ko CM ke pas v jana chahiye.

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